
Ret Samadhi
by Rajkamal Prakashan Pvt. Ltd
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MPN9789387462250
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Product Description
अससी की होन चली दादी न विधवा होकर परिवार स पीठकर खटिया पकड ली। परिवार उस वापस अपन बीच खीचन म लगा। परम, वर, आपसी नोकà¤à¥‹à¤• म खदबदाता सयकत परिवार। दादी बजिद कि अब नही उठगी। फिर इनही शबदो की धवनि बदलकर हो जाती ह अब तो नई ही उठगी। दादी उठती ह। बिलकल नई। नया बचपन, नई जवानी, सामाजिक वरजनाओ-निषधो स मकत, नठरिशतो और नठतवरो म परण सवचछनद। हर साधारण औरत म छिपी à¤à¤• असाधारण सतरी की महागाथा तो ह ही रत-समाधि, सयकत परिवार की ततकालीन सथिति, दश क हालात और सामानय मानवीय नियति का विलकषण चितरण à¤à¥€ ह। और ह à¤à¤• अमर परम परसग व रोजी जसा अविसमरणीय चरितर। कथा लखन की à¤à¤• नयी छटा ह इस उपनयास म। इसकी कथा, इसका कालकरम, इसकी सवदना, इसका कहन, सब अपन निराल अनदाज म चलत ह। हमारी चिर-परिचित हदो-सरहदो को नकारत लाघत। जाना-पहचाना à¤à¥€ बिलकल अनोखा और नया ह यहा। इसका ससार परिचित à¤à¥€ ह और जादई à¤à¥€, दोनो क अनतर को मिटाता। काल à¤à¥€ यहा अपनी निरतरता म आता ह।'
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